म्हारो रँगीलो राजस्थान
प्रथम दृष्ट्या राजस्थान का नाम आते ही आपकी आँखों के सामने धोरे , मिट्टी के टीले , पानी की कमी वाले राजस्थान की तस्वीर तैरने लगती होगी | क्या यही राजस्थान है जो आप सोचते आ रहें हैं | तो हम आपको उस राजस्थान से रूबरू करवातें है जिससे शायद आप अभी तक अनजान हैं –
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राजस्थान, जिसकी धरा को बारिश से अधिक इसके वीर सपूतों ने
अपने रक्त से सींचा है, और इसे कवियों ने अपने काव्य मे भी शामिल किया है |
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वह
राजस्थान जिसने सैंकड़ों सालों तक बाहरी आक्रान्ताओं को भारतीय सीमा में अपने पैर
नहीं जमाने दिए ओर इस भारत को अखंड बनाए रखा |
· हम बात कर रहे हैं उस राजस्थान की जिसने आज तक कभी भी भारत से किसी भी प्रकार का अलगाववाद नहीं रखा और हमेशा उसके साथ बना रहा |
· हम बात कर रहे हैं उस राजस्थान की जहां महाराणा प्रताप, राणा कुंभा, महाराणा राज सिंह, राव मालदेव, राव चंद्रसेन, जसवंत सिंह, राव जोधा, बीका, सवाई जय सिंह, मिर्जा राजा मान सिंह, पृथ्वीराज चौहान, नाग भट्ट, विग्रहराज चतुर्थ आदि जैसे महान शासक, विद्वान राजस्थान की धरा पर पैदा हुए |
ऐसे ही वीर राणा अमर सिंह दिवेर थाने के मुखिया सुल्तान खान को घोड़े सहित, भाले के एक ही वार से भेद दिया था |
हम बात कर रहे हैं उस राजस्थान की धरती की जिसकी वीरांगनाओ ने शत्रु सेना के सामने समर्पण कर अधीनता स्वीकार करने की बजाय जोहराग्नि की लपटों में खुद को झोंक देना अधिक स्वीकार्य समझा |
ज्वाला जौहर री जगी, चमक उठ्यो चित्तौड़
पदमण पावक बैठगी, सतिया री सिरमौड़ ||
हम बात कर रहे हैं उस राजस्थान की धरा की जहां नारायणी देवी वर्मा, अंजना देवी चौधरी, जानकी देवी बजाज, सावित्री देवी भाटी जैसी अनेक महिलाओं ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया |
· यह धरती है भामाशाह, ताराचंद, अमरचंद बांठीया, राय सिंह जैसों दानवीरों की, पन्ना जैसी धाय माताओं की, आल्हा-ऊदल जैसों वीरों की, ढोला मरवण के प्रेम की, प्रताप के शौर्य की |
इन्हीं को चरितार्थ करती कुछ पंक्तियाँ हैं –
ढोला मरवण प्रेम कहाणी, गावे कवि सुजान |
आल्हा ऊदल वीर कहाणी, चारण करै बखान ||
· यह उन बारहठों ( केसरी सिंह बारहठ, प्रताप सिंह बारहठ, जोरावर सिंह बारहठ ) की मातृभूमि है जिन्होंने अपने सम्पूर्ण परिवार को देश हित और देशभक्ति के लिए बलिदान कर दिया |
· इस धरा पर गोगा जी, रामदेव जी, मेहा जी, पाबू जी, तेजा जी, जांभोजी, दादू दयाल आदि जैसे महान व्यक्तित्व हुए जिन्होंने लोक हित हेतु अपना सम्पूर्ण जीवन न्यौछावर कर दिया और आज हमारे समाज में लोक देवता या पूज्य देव के रूप में पूजे जाते हैं |
· इस पवित्र धरती पर उत्पन्न कवि माघ, उद्योतन सूरी, दुरसा आढा, सदाशिव भट्ट, सूर्यमल्ल मिश्रण, कन्हैया लाल सेठिया, विजयदान देथा, कवि कल्लोल, बांकीदास आदि कवियों ने राजस्थान साहित्य के साथ साथ हिन्दी साहित्य में भी अमूल्य योगदान दिया है |
· प्रकृति प्रेमी राजस्थान में वृक्षों को बचाने के लिए 12 सितंबर 1730 में जोधपुर राजा अभय सिंह के पेड़ों को काटने के आदेश के खिलाफ अमृता देवी और उसकी पुत्रियों सहित 363 लोगों ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया था | राजस्थान विश्व में एक मात्र स्थान जहां वृक्ष मेले \ खेजड़ली मेले का आयोजन होता है |
संस्कृति :- राजस्थान की संस्कृति, रंगीलो राजस्थान को चरितार्थ करती हुई रंग बिरंगी ओर आकर्षक है | इसके उत्तर-पूर्व में हरियाणा व पंजाब के खान पान, भाषा व संस्कृति का मिश्रण है तो, पूर्व में उत्तरप्रदेश की ब्रज व अवधी भाषा का प्रभाव, दक्षिण पूर्व में मध्य प्रदेश का प्रभाव, दक्षिण पश्चिम में गुजरात का प्रभाव दिखाई देता है, जो राजस्थान को एक अलग ही श्रेणी में ले जाकर खड़ा करता है |
भाषा – यहाँ मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, वागड़ी, अहिरवाटी, मालवी, शेखावाटी आदि भाषाएं बोली जाती हैं |
खान पान – राजस्थान का दाल बाटी चूरमा सारे देश के साथ साथ विश्व भर में प्रसिद्ध है | मारवाड़ की सांगरी, शेखावाटी की केर सांगरी, कोटा की प्याज कचोरी , जोधपुर की मावा कचोरी, अलवर का कलाकंद, बीकानेरी भुजिया आदि देश भर में अपनी पहचान रखते हैं |
संगीत – ध्रुपद गायकी,ख्याल शैली,जयपुर घराना, पटियाला घराना, रंगीला घराना, दिल्ली घराने में राजस्थान का विशेष योगदान है | कथक नृत्य की हिन्दू शैली का प्रतिनिधित्व जयपुर घराना ही करता है |
नृत्य – राजस्थान का लोक नृत्य घूमर है | घूमर के अतिरिक्त भी राजस्थान में गैर नृत्य, अग्नि नृत्य, कालबेलिया नृत्य ( जिसे 2010 में यूनेस्को ने अमूर्त विरासत सूची में शामिल किया है ), भवाई नृत्य, चरी नृत्य आदि नृत्य देश सहित विदेशों मे भी अपनी छाप छोड़ चुके हैं और प्रसिद्ध हैं |
वेशभूषा :- राजस्थान की वेशभूषा में गहरे ओर अधिक रंगों का प्रयोग नजर आता है | जैसे महिलाओं की लहरिया साड़ी, पुरुषों का पचरंगा साफा या पगड़ी | महिलायें चटक या गहरे रंग पहनना अधिक पसंद करती हैं जैसे लाल, गुलाबी, पीला | महिलाएं घाघरा लुगड़ी, पोमचा, ज्वारभाँत व ताराभाँत की ओढ़नी, कछावू(आदिवासी महिलाओं द्वारा ) , चूनड़ी वस्त्र पहने जाते हैं |
पुरुषों द्वारा धोती कुर्ता, पगड़ी, अंगरखी, अंगोछा और अचकन पहने जाते है |
विशेषताओं से ओतप्रोत राजस्थान नाम का ही रंगीला राजस्थान नहीं है, वे सभी विशेषताएं इसमें विद्यमान हैं जो इसे रंगीला \ रँगीलो राजस्थान बनाती हैं | इस धोरां री धरती के लिए कवि ने सही ही कहा है –
दीधां नीज गुण देवता, रिखीयां दी आशीष |
सिरजी जीण दिन मरुधरा, सोणी नायो शीष ||

